प्रभा खेतान के उपन्यासों में संघर्षशील नारी

  • कु॰ विजयलक्ष्मी वर्मा

Abstract

भारत एक पुरुष प्रधान देश है जहाँ पर नारियों को पुरुषों की अपेक्षा गौण रूपों में देखा जाता है। पुरुष समाज ने नारी को शक्तिहीन, कमजोर, अबला ठहराते हुए उसे अनेक सांसारिक नियमों एवं परम्पराओं के बन्धन में जकड़ दिया है। और नारी पर अपना पूर्ण अधिकार चाहता है। पुरुष वर्ग नारियों को अपने अधीन मानते हुए उसके साथ अनेक प्रकार के अत्याचार एवं घिनौने अपराध करता आया है। परन्तु वर्तमान काल में ऐसा नहीं रहा। जब उन्हें चहर दीवारी से बार निकल कर शिक्षित होने का अवसर प्राप्त हुआ, तब उनमें भी आजादी के बाद प्राप्त हुए संवैधानिक समानाधिकारों के प्रति जागरूकता आयी। अपनी स्थिति एवं अस्तित्व को बनाये रखने के लिए नारियों ने अथक प्रयास किया, किन्तु फिर भी समाज में नारी को वह स्थान अभी भी नहीं मिल पाया जो मिलना चाहिए। इस पुरुष प्रधान देश में आज भी रूह कँपा देने वाली अमानवीय घटनाएं दिन-प्रतिदिन समाचार पत्रों व दूरदर्शन के माध्यम से हमारे सामने आती रहती हैं, जिसको अंजाम पुरुष वर्ग द्वारा ही दिया जाता है। जो पुरुषों की पाशविक प्रवृत्ति एवं घटिया मांसकिता की सूचक हैं। अपने प्रति पुरुषों द्वारा किये गये अमानवीय व्यवहार को सहन न करके आधुनिक नारी परम्पराओं एवं मान्यताओं के विपरीत एक नई भावभूमि पर अपने व्यक्तित्व का निर्माण करने के लिए निरन्तर संघर्षशील है।
How to Cite
कु॰ विजयलक्ष्मी वर्मा. (1). प्रभा खेतान के उपन्यासों में संघर्षशील नारी. International Journal Of Innovation In Engineering Research & Management UGC APPROVED NO. 48708, EFI 5.89, WORLD SCINTIFIC IF 6.33, 7(7), 25-28. Retrieved from http://journal.ijierm.co.in/index.php/ijierm/article/view/41